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अमेरिका की खोज 

अमेरिका की खोज क्रिस्टोफर कोलम्बस (Christopher Columbus) ने की थी या भारत की खोज वास्को डी गामा ने के थी, ये बिलकुल वैसे ही तथ्य हैं जैसे आपके परिवार से कोई पहली बार अमेरिका जाय और वापस लौट कर आपसे कहे की अमेरिका की खोज मैंने की है |
लेकिन आप उस सदस्य की बात नहीं मानेंगे बल्कि उस पर हसेंगे और उसे चुप रहने की सलाह देंगे, क्यों, क्योंकि आपको पता है कि सैकड़ों साल पहले से दूसरे देशों के लोग अमेरिका जा रहे हैं और वहां से वापस आ रहे हैं |किन्तु पाँच से छः सौ साल पहले ऐसा नहीं था | पश्चिमी जगत, अमेरिकी महाद्वीप की रहस्यमय धरती से पूरी तरह अंजान था | पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में (1492 में) पहली बार Columbus उस ‘नई दुनिया’ की धरती पर पाँव रखा, जिसे आज दुनिया अमेरिका के नाम से जानती है |

कोलंबस दिवस (Columbus Day)

अमेरिकी लोग प्रत्येक वर्ष के अक्तूबर माह के दूसरे सोमवार को Columbus Day (कोलम्बस दिवस) के रूप में मनाते हैं | इस दिन अमेरिका में ज्यादातर जगहों पर अवकाश घोषित होता है |
लेकिन ऐसा नहीं था कि कोलम्बस से पहले अमेरिका में कोई रहता नहीं था या दुनिया अमेरिका के बारे में जानती नहीं थी | पुरातत्ववेत्ताओं और शोधकर्ताओं का काम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, अमेरिकी धरती पर फलने-फूलने वाली प्राचीन सभ्यताओं के इतिहास पर छाई धुंध थोड़ी छँटने लगी है।
इन्का, माया, अज्टेक सभ्यताओं के रहस्य खुलने अभी आरम्भ ही हुए थे कि अमेरिका की प्राचीनतम सभ्यता के अवशेष मिलने लगे | ये ओल्मेक सभ्यता (Olmec Civilization) थी | ओल्मेक सभ्यता के जो भी अवशेष मिले हैं वो काफी रहस्यमय हैं |
मिले हुए साक्ष्यों के आधार पर ऐसा माना जाता है कि 1200 वर्ष ईसवी पूर्व से 200 वर्ष ईसवी पूर्व तक ये सभ्यता मध्य अमेरिका तथा आस-पास के क्षेत्रों में फली-फूली |

अमेरिका में मानव कब बसे

वैज्ञानिक मानते हैं की लाघबाहग 15 हजार साल पहले बेरिंग जमीनी पूल (Bering land Bridge) के जरिए साइबेरिया से अमेरिका महादीप पर पहुंचे। 
Bering land Bridge एक जमीनी पूल था जो एशिया के साइबरया क्षेत्र को उत्तरी अमेरिका के अलास्का क्षेत्र से जोड़ता था। अब यह जमीनी भाग समुन्द्र में डूब  चूका हैं। 
बेरिंग जमीनी पूल के जरिए मानव पहले अलास्का पंहुचा और फिर वहां से अमेरिका महादीप के विभ्भिन्न हिस्सों में फ़ैल गया। समय बीतने के साथ साथ उन्होंने कृषि करना सीखा और धीरे धीरे नयी तकनीकों का विकास करने लगे। 
अभी तक पुरातत्वशास्त्रियों को लेगूना डी लोस सिरोस (Laguna de los cerros), सैन लोरेंजो (San Lorenzo), ट्रेस ज़पोटेस (Tres Zapotes) और ला वेंटा (La Venta) नामक चार जगहों पर ओल्मेक सभ्यता के प्रमाणिक चिन्ह मिले हैं। 
इनके आस-पास रबड़ के पेड़ों के होने की वजह से ही इस सभ्यता के संस्थापको को ‘ओल्मेक’ कहा जाता है क्योंकि रबड़ को वहां की स्थानीय भाषा में ओलिन (Ollin) कहा जाता है | ओल्मेक सभ्यता को स्थानीय भाषा में Cultura Madre यानि Mother Culture of Central America भी कहा जाता है |
ये सही भी है क्योंकि उसके बाद फलने-फूलने वाली लगभग सभी प्राचीन अमेरिकी सभ्यताओं की कड़ियाँ कही-न-कहीं ओल्मेक सभ्यता से जुड़ती हैं तो फिर ओल्मेक लोग कौन थे? और कहाँ से आये थे ? लगभग तेरहवीं शताब्दी ईसा पूर्व में, मेक्सिको की खाड़ी में, अपने अस्तित्व में आई ये सभ्यता एक दिन अचानक से गायब भी हो गयी, इनका पूरा अस्तित्व ही समाप्त हो गया |
मध्य अमेरिका के घने, उष्णकटिबंधीय जंगल, नीची दलदली जमीन, नदियों और सोतो की बाढ़-किसी भी सभ्यता के विकास के लिए अच्छी खासी दुर्गम परिस्थितियां होती हैं लेकिन इन्ही कठिनाइयों से जूझते हुए ओल्मेक सभ्यता विकसित हुई |
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 यह तथ्य इस सभ्यता के प्राप्त हुए अद्भुत अवशेषोंको और भी कौतूहलपूर्ण बना देता है, उस पर से इस सभ्यता का अचानक से बिना कोई निशान छोड़े, गायब हो जाना शोधकर्ताओं के दिल-दिमाग में खलबली मचाये हुए है |
यद्यपि ओल्मेक सभ्यता के लोगों ने स्वयं अपनी एक लेखन प्रणाली विकसित की थी लेकिन वर्तमान समय तक पुरातत्ववेत्ताओं को अधिक अभिलेख नहीं मिल पाए हैं इस सभ्यता के, इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में पांडुलिपियाँ भी नहीं मिल पायी हैं कि विद्वान उनकी लिपि के रहस्यमय शब्दों को समझ सके |
परिणामस्वरूप आज हम जो भी ओल्मेक सभ्यता के बारे में जानते हैं वो पुरातात्विक खुदाई में मिलने वाले अद्भुत अवशेषों को देखकर लगने वाले अनुमान पर आधारित है | उदहारण के तौर पर ओल्मेक वासी अपने पीछे अपने द्वारा बनायी गयी अद्भुत शिल्पकृतियाँ छोड़ गए हैं |
उनमे सबसे प्रसिद्ध है उनके द्वारा निर्मित ‘विशालकाय मानव सिर’ | इस पृष्ठ पर दिए गए चित्र से आप अंदाजा लगा सकते हैं | इन चेहरों की आकृतियाँ व भाव देखकर मानव विज्ञानी चकित रह गए क्योंकि वे इन चेहरों को किसी भी जानी-पहचानी मानव सभ्यता से जोड़ने में सफल नहीं हो पा रहे थे |
रहस्यमय मानवीय सर की ये प्रतियाँ बासाल्ट (एक प्रकार की घनी, गहरे सुरमई रंग की अत्यंत कठोर चट्टान) के गोल शिलाखंड को तराश कर बनायी गयी हैं | तकनीकी रूप से आज के समय में, आज के अत्याधुनिक यंत्रो से भी ये कार्य कर पाना मुश्किल काम है |
आज से 3200 वर्ष पूर्व किसी सभ्यता के द्वारा किया गया ऐसा कार्य आश्चर्य पैदा करता है | वर्तमान समय तक कम-से-कम अठारह कृतियाँ इस तरह की पायी जा चुकी हैं |
ये विशालकाय मानवीय सिर, जिनकी ऊँचाई एक से तीन मीटर तक है, प्रौढ़ मनुष्यों के हैं जिनकी तिरछी आँखे, फैली हुई नाक, उभरे हुए गाल हैं | ऐसा प्रतीत होता है कि ये रहस्यमय सिर, ओल्मेक के शासकों या वहां के प्रभावशाली लोगों के रहे होंगे जिन्होंने अपनी बढ़ी हुई शक्ति के प्रतीक स्वरुप में इनका निर्माण कराया होगा जिस प्रकार से कम्बोडिया के अंगकोरधाम में जय वर्मन सप्तम ने करवाया था |
लगभग 1000 वर्षों तक मेक्सिको का ला वेंटा ओल्मेक सभ्यता का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र बना रहा | यहाँ पर एक छोटा सीढ़ीयों से बना हुआ पिरामिड पाया गया है | जिसके सामने एक चौकोर छत्र बना हुआ है जो अपने चारो कोनो पर खड़े बासाल्ट के खम्बों पर टिका हुआ है |
पास ही में दो सामानांतर टीलों की सीमा से घिरा हुआ अमेरिका का सबसे पुराना गेंद खेलने का कोर्ट निर्मित किया गया है | इन स्मारकों के अन्दर तराशी हुई नक्काशीदार चट्टानें, अलंकृत वेदियाँ, तथा बासाल्ट के विशालकाय चेहरे मिले हैं |
वहां के एक गाँव में स्थित चर्च के पास, हरे रंग के पत्थर की एक ऐसी शिल्पकृति मिली है जिसे देख कर लगता है जैसे कोई कुआंरी स्त्री एक बच्चे को गोद में उठाये हुए है जबकि कुछ विद्वानों का अनुमान है कि ये मूर्ती एक पुरुष की है जो की वर्षा के देवता को अपने हांथो में उठाये हुए है |
इसी तरह की एक अन्य रहस्यमय मूर्ती बासाल्ट के एक खम्भे के रूप में पायी गयी है जिसमे बन्दर जैसे चेहरे वाला एक मनुष्य आकाश की ओर देख रहा है |
लोग आज भी इसे देखकर असमंजस में पड़ जाते है कि ये मनुष्य जैसा बन्दर है या बन्दर जैसे चेहरे वाला मनुष्य ? बासाल्ट के 18 से 20 टन वज़नी पत्थर से बनायी ही दैत्याकार चेहरों की मूर्तियाँ देखकर पुरातत्ववेत्ताओं ने अनुमान लगाया कि ये पत्थर यहाँ नदियों के रास्ते से लाये गए होंगे |
ज्यादातर शोधकर्ता मानते हैं कि ये दैत्याकार चेहरे वहां के राजाओं या प्रभावशाली लोगों के रहे होंगे लेकिन वही कुछ अन्य विद्वानों का विचार है कि ये चेहरे, साधे तीन पौंड भारी रबर की गेंद से खेले जाने वाले एक खतरनाक खेल के पराजित खिलाड़ियों के हैं |
वैसे इन चेहरों के सिर के ऊपर रखे पहनावे को देख कर लगता है कि ऐसा हो भी सकता है | ओल्मेक समाज एक शक्तिशाली, सक्षम और संगठित समाज था लेकिन 200 वर्ष ईसवी पूर्व आते-आते ये सभ्यता, विश्वपटल के इतिहास से, एकदम से ग़ायब हो जाती है | कारण आज भी अज्ञात है |
यद्यपि इस सभ्यता की खोज अभी हाल ही की है, लेकिन अभिलेखों और पुरातात्विक अवशेषों से पता चलता है कि बाद में विकसित होने वाली सभ्यताओं जैसे अज्टेक सभ्यता (Aztec Civilization), माया सभ्यता (Maya Civilization) आदि पर ओल्मेक सभ्यता का गहरा प्रभाव था |
उदहारण के तौर पर, जब स्पेनिश लोगों का सामना एज़्टेक वासियों से हुआ तो उन लोगों ने एज़्टेक वासियों को रबड़ की गेंद से एक विशेष प्रकार का खेल खेलते हुए देखा, जो वास्तव में ओल्मेक सभ्यता की देन थी |

इस खेल के अलावा कुछ अन्य विशेषताएं (जैसे अंतरिक्ष में सौर-व्यवस्था के अध्ययन सम्बन्धी) भी ओल्मेक सभ्यता की देन थी जिसे माया आदि सभ्यताओं ने अपना लिया |
ओल्मेक सभ्यता के संस्थापक कौन थे?, कहाँ से आये थे और कहाँ गायब हो गए ? इन प्रश्नों के उत्तर पर फिलहाल रहस्य का पर्दा पड़ा है | कौन जाने जिन्हें दुनिया धरती के बाहर अंतरिक्ष में ढूंढ रही है उनके अतीत धरती से ही जुड़े हों | लेकिन अगर ऐसा है तो हमें बाहर की बजाय ‘अन्दर’ का रास्ता ढूँढना होगा


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